आमलकी एकादशी 2026 - तिथि, पारण समय, पूजा विधि, पद्म पुराण कथा और विष्णु मंत्र
आमलकी एकादशी 2026 कब है? जानिए तिथि, पारण समय और व्रत विधि
आमलकी एकादशी अत्यंत शुभ मानी गई है और यह मनुष्य को विष्णुलोक की प्राप्ति कराती है। पंचांग के अनुसार फाल्गुन मास के शुक्लपक्ष की एकादशी 26 फरवरी 2026, 00:33 बजे आरंभ होगी और 27 फरवरी 2026 की रात्रि को 10:32 बजे तक रहेगी। ऐसे में उदया तिथि को आधार मानते हुए 27 फरवरी 2026, शुक्रवार के दिन ही आमलकी एकादशी का व्रत रखा जाएगा। आमलकी एकादशी व्रत का पारण अगले दिन 28 फरवरी 2026, शनिवार को प्रातःकाल 06:47 से 09:06 बजे के बीच किया जा सकेगा।

आमलकी एकादशी व्रत की पूजा विधि
- एकादशी के दिन तथा द्वादशी के प्रातःकाल तक पूर्ण उपवास रखें और मन, वाणी व कर्म से संयम का पालन करें।
- स्नान से पूर्व पृथ्वी और जल को प्रणाम करते हुए शरीर पर मिट्टी लगाएँ और पवित्र जल से स्नान करें।
- स्नान के बाद स्वच्छ वस्त्र धारण कर भगवान विष्णु का ध्यान करें और यह संकल्प लें कि “हे कमलनयन प्रभु! हे अच्युत! आज मैं आपके आश्रय में आमलकी एकादशी व्रत कर रहा हूँ।”
- आमलकी (आंवला) के वृक्ष के पास जाकर दीप प्रज्वलित करें और रात्रि में जागरण का संकल्प लें।
- आमलकी वृक्ष के समीप एक सुंदर कलश स्थापित करें, जो सोने, चाँदी, ताँबे या मिट्टी का हो और उसमें शुद्ध जल भरें।
- उस कलश में अंकुरित अन्न (जौ, चना आदि) रखें तथा उस पर भगवान नारायण की स्वर्ण या प्रतीकात्मक प्रतिमा स्थापित करें।
- कलश के साथ पुष्प, धूप, दीप, चंदन, नैवेद्य, सुपारी, नारियल आदि अर्पित करें और विष्णु मंत्रों का जप करें।
- पूरी रात्रि विष्णु कथा, नाम-स्मरण, भजन-कीर्तन करते हुए जागरण करें।
- द्वादशी की प्रातःकालीन बेला में कलश को नदी, तालाब या जलधारा में विसर्जित करें अथवा ब्राह्मण को दान करें।
- ब्राह्मणों को भोजन कराएँ, दान दें और श्रद्धापूर्वक व्रत का पारण करें।
- इस विधि से किया गया आमलकी एकादशी व्रत समस्त तीर्थ, दान और यज्ञों के समान फल प्रदान करने वाला माना गया है।
आमलकी एकादशी व्रत कथा
पद्म पुराण के अनुसार, एक बार धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की आमलकी एकादशी के महात्म्य के विषय में पूछा। फिर भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें बताया कि यह व्रत महर्षि वशिष्ठ द्वारा राजा मांधाता को उपदेश रूप में बताया गया था और यह व्रत विष्णुलोक की प्राप्ति कराने वाला तथा समस्त पापों का नाश करने वाला माना गया है। वशिष्ठ मुनि ने बताया कि प्राचीन काल में जब संपूर्ण पृथ्वी जलमग्न थी और स्थावर प्राणी, देवता, दानव, सर्प तथा राक्षस सभी लुप्त हो चुके थे, तब ब्रह्मा जी के मुख से एक दिव्य तेजस्वी बिंदु उत्पन्न हुआ जो पृथ्वी पर गिरा। उस दिव्य बिंदु से आमलकी अर्थात् आंवले का महान वृक्ष उत्पन्न हुआ, जिसकी शाखाएँ फलों के भार से झुकी हुई थीं।
इसके बाद जब देवता, ऋषि-मुनि और अन्य दिव्य प्राणी वहाँ पहुँचे तो वे उस वृक्ष को देखकर आश्चर्य में पड़ गए और उसके विषय में सोचने लगे। तभी आकाशवाणी हुई कि यह आमलकी वृक्ष स्वयं भगवान विष्णु का स्वरूप है और केवल इसके स्मरण से गौदान का फल प्राप्त होता है, इसके स्पर्श से पुण्य दोगुना और धारण करने से पुण्य तीन गुना हो जाता है। आकाशवाणी में यह भी कहा गया कि आमलकी के मूल में भगवान विष्णु का वास है, इसके तने में ब्रह्मा जी निवास करते हैं, इसकी शाखाओं में ऋषि रहते हैं, इसकी टहनियों में देवता, इसके पत्तों में मरुद्गण तथा इसके फलों में समस्त लोकों के अधिपति विराजमान हैं। इस प्रकार यह वृक्ष संपूर्ण सृष्टि का प्रतीक है और विष्णु भक्तों के लिए अत्यंत पूजनीय है।
ऋषियों के अनुरोध पर भगवान विष्णु स्वयं प्रकट हुए और उन्होंने बताया कि फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की आमलकी एकादशी का व्रत समस्त व्रतों में श्रेष्ठ है। इस दिन आमलकी वृक्ष के समीप रात्रि जागरण करने वाला मनुष्य समस्त पापों से मुक्त हो जाता है और उसे सहस्र गौदान के समान पुण्य फल प्राप्त होता है। भगवान विष्णु ने यह भी कहा कि जो श्रद्धा और नियमपूर्वक आमलकी एकादशी का पालन करता है, वह विष्णुलोक से कभी पतित नहीं होता और उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है। इस प्रकार आमलकी एकादशी व्रत का महात्म्य समस्त तीर्थ, दान और यज्ञों से भी अधिक पुण्यदायक माना गया है।
आमलकी एकादशी पर करें इन मंत्रों का जप
विष्णु मंत्र
“ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।”
विष्णु रक्षा मंत्र
“शांताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम्।
लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्॥”
क्लेश नाशक श्री विष्णु मंत्र कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने । प्रणत क्लेश नाशाय गोविन्दाय नमो नमः।
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आमलकी एकादशी व्रत का आध्यात्मिक महत्व और फल
आमलकी एकादशी केवल उपवास का व्रत नहीं है, बल्कि यह भगवान विष्णु की शरण में जाकर जीवन के समस्त पापों, भय और बाधाओं से मुक्त होने की आध्यात्मिक साधना है। पद्म पुराण में वर्णित कथा यह दर्शाती है कि आमलकी (आंवला) वृक्ष स्वयं भगवान विष्णु तत्व का प्रतीक है और इसके समीप श्रद्धा से किया गया जागरण भक्त को विष्णुलोक की प्राप्ति कराता है। नियमपूर्वक किया गया यह व्रत मन को शुद्ध करता है, कर्मों का बोझ हल्का करता है और साधक को भक्ति, वैराग्य तथा अंततः मोक्ष के मार्ग की ओर अग्रसर करता है।