Ganesh Aarti

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गणेश आरती का महत्त्व

गणेश आरती भगवान गणेश की उपासना का एक अत्यंत महत्वपूर्ण अंग मानी जाती है। पूजा के अंत में आरती करने से साधक अपने मन, कर्म और भाव से भगवान के प्रति कृतज्ञता और समर्पण प्रकट करता है। मान्यता है कि गणेश आरती करने से जीवन में आने वाले विघ्न, बाधाएँ और मानसिक अशांति दूर होती हैं। शास्त्रों और लोक परंपराओं के अनुसार आरती के माध्यम से पूजा पूर्ण होती है और उसका फल साधक को प्राप्त होता है। विशेष रूप से किसी भी शुभ कार्य, व्रत या पूजा के समापन पर गणेश आरती करने से भगवान गणेश की विशेष कृपा प्राप्त होती है।


श्री गणेश आरती

जय गणेश, जय गणेश, जय गणेश देवा।
माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा॥

एकदंत दयावंत, चार भुजाधारी।
माथे सिंदूर सोहे, मूसे की सवारी॥

पान चढ़े, फूल चढ़े और चढ़े मेवा।
लड्डुअन का भोग लगे, संत करें सेवा॥

जय गणेश, जय गणेश, जय गणेश देवा।
माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा॥

अंधन को आँख देत, कोढ़िन को काया।
बांझन को पुत्र देत, निर्धन को माया॥

सूर श्याम शरण आए, सफल कीजे सेवा।
जय गणेश, जय गणेश, जय गणेश देवा॥

माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा॥


श्री गणेश आरती (सुखकर्ता दुखहर्ता)

सुखकर्ता दुखहर्ता वार्ता विघ्नाची।
नुरवी पुरवी प्रेम कृपा जयाची॥

सर्वांगी सुंदर उटी शेंदुराची।
कंठी झळके माल मुक्ताफळांची॥

जय देव जय देव जय मंगलमूर्ती।
दर्शनमात्रे मनकामना पूर्ति॥

रत्नखचित फरा तुझ गौरीकुमरा।
चंदनाची उटी कुमकुम केशरा॥

हीरे जडित मुकुट शोभतो बरा।
रुणझुणती नूपुरे चरणी घागरिया॥

जय देव जय देव जय मंगलमूर्ती।
दर्शनमात्रे मनकामना पूर्ति॥

लंबोदर पीतांबर फणिवर बंधना।
सरळ सोंड वक्रतुंड त्रिनयना॥

दास रामाचा वाट पाहे सदना।
संकटी पावावे निर्वाणी रक्षावे सुरवर वंदना॥

जय देव जय देव जय मंगलमूर्ती।
दर्शनमात्रे मनकामना पूर्ति॥


समापन भाव

गणेश आरती केवल एक स्तुति नहीं, बल्कि भक्त और भगवान के बीच भावनात्मक संबंध का माध्यम है। आरती के माध्यम से साधक अपने जीवन की सभी चिंताओं, बाधाओं और भय को भगवान गणेश के चरणों में समर्पित करता है। श्रद्धा और विश्वास के साथ की गई गणेश आरती जीवन में स्थिरता, विवेक और मंगल भाव को जाग्रत करती है।

ॐ श्री गणेशाय नमः ॥

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