संकर्षण विनायक चतुर्थी व्रत 2026 - तिथि, पूजा विधि, कथा और मंत्र
अप्रैल 2026 में संकर्षण विनायक चतुर्थी कब है?
संकर्षण विनायक चतुर्थी भगवान गणेश को समर्पित एक महत्वपूर्ण व्रत है, जो वैशाख मास के शुक्ल पक्ष में आता है। इस दिन विधि से पूजन करने पर बाधाएं समाप्त होती हैं और मन में स्थिरता बनती है। अप्रैल 2026 में यह व्रत सोमवार, 20 अप्रैल को रखा जाएगा। चतुर्थी तिथि 20 अप्रैल को प्रातः 07:27–07:28 बजे से प्रारंभ होकर 21 अप्रैल को प्रातः 04:14–04:15 बजे तक रहेगी। उदयातिथि के अनुसार व्रत 20 अप्रैल 2026 को ही मनाया जायेगा। गणेश पूजन का श्रेष्ठ मध्यान्ह मुहूर्त 11:22 बजे से 01:53 बजे तक रहेगा। ब्रह्म मुहूर्त लगभग 05:30 से 06:10 बजे तक रहेगा, जबकि राहु काल 08:35 से 10:20 बजे तक है, इस समय पूजन आरंभ न करें। व्रत पारण 21 अप्रैल को प्रातः 04:15 बजे के बाद किया जा सकता है। आइए जानते हैं व्रत का महत्व, पूजा विधि और व्रत कथा

संकर्षण विनायक चतुर्थी का महत्व
वैशाख मास की शुक्ल चतुर्थी का दिन साधकों के लिए एक विशेष अवसर लेकर आता है। चतुर्थी तिथि भगवान गणेश को सर्वाधिक प्रिय है, यह बात गणेश पुराण, स्कन्द पुराण और वृत्तराज जैसे ग्रंथों में बारम्बार कही गई है। जब प्रकृति नई कोंपलों और वसंत की ऊष्मा से भरी होती है, तब यह तिथि भगवान गणेश के संकर्षण स्वरूप की उपासना के लिए निर्धारित की गई है। वैशाख शुक्ल चतुर्थी को जो व्रत किया जाता है, उसे संकर्षण विनायक चतुर्थी व्रत कहते हैं। धर्मसिन्धु में इस व्रत की चर्चा करते हुए स्पष्ट कहा गया है, वैशाखे चतुर्थ्यां तु व्रतमेतत् समाचरेत्, सुमुखं पूजयित्वा तु सिद्धिं लभते निश्चितम् अर्थात् वैशाख चतुर्थी को यह व्रत करने से और सुमुख गणेश की पूजा करने से निश्चित सिद्धि की प्राप्ति होती है। वृत्तराज ग्रंथ इस व्रत को सर्वसिद्धिप्रद कहता है, यानी यह व्रत सभी प्रकार के कार्यों में सफलता देने वाला है। इस दिन मध्याह्नकाल में गणेश पूजन का विशेष विधान है, क्योंकि शास्त्रों के अनुसार भगवान गणेश का आविर्भाव मध्याह्न वेला में हुआ था। व्यापार, विद्या या नवीन कार्यों में बाधाओं का सामना कर रहे जन इस व्रत से विशेष लाभ पाते हैं। इस दिन ब्राह्मणों को शंख का दान करने की परम्परा भी प्रचलित है, जो इस व्रत की अपनी एक अनोखी पहचान है।
संकर्षण विनायक चतुर्थी व्रत 2026 की पूजा विधि
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संकर्षण विनायक चतुर्थी व्रत के दिन प्रातःकाल सूर्योदय से पूर्व उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें, फिर मन में गणेश स्मरण करते हुए व्रत का संकल्प लें।
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पूजा स्थान को गंगाजल से शुद्ध करें और भगवान गणेश की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। लाल वस्त्र बिछाकर उन पर अक्षत रखें और गणेश जी को विराजमान करें।
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इस व्रत में मध्याह्नकाल की पूजा का विशेष महत्व है। दोपहर के समय षोडशोपचार विधि से गणेश पूजन करें, धूप, दीप, नैवेद्य और दूर्वा अर्पित करें तथा लाल पुष्प चढ़ाएँ।
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मोदक और लड्डू का भोग लगाएँ। गुड़, तिल और नारियल भी नैवेद्य में रखे जा सकते हैं। भोग अर्पित करने के बाद गणेश आरती अवश्य करें।
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पूजा के समय गणेश मंत्रों का जप करें। ॐ गं गणपतये नमः का कम से कम एक माला जप करना उत्तम रहता है।
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इस व्रत में ब्राह्मणों को शंख का दान करने की परम्परा है। सामर्थ्य अनुसार शंख, फल या दक्षिणा अर्पित करें और उनसे आशीर्वाद लें।
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व्रत के दिन अन्न का त्याग करें। फलाहार या दूध पर रहें। झूठ बोलने, क्रोध करने और व्यर्थ वाद-विवाद से बचें, क्योंकि व्रत की शुद्धता मन और वाणी दोनों से होती है।
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सायंकाल पुनः गणेश पूजन करें और संकर्षण विनायक व्रत कथा का श्रवण या पाठ करें। कथा सुने बिना व्रत अधूरा माना जाता है।
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रात्रि में सात्विक भोजन ग्रहण करें या अगले दिन पञ्चमी तिथि में किसी ब्राह्मण को भोजन कराकर पारण करें। पारण के बाद ही व्रत पूर्ण माना जाता है।
संकर्षण विनायक चतुर्थी व्रत कथा
बहुत पुराने समय की बात है, किसी सुदूर राज्य में ब्रह्मप्रिय नाम के एक धर्मपरायण राजा राज्य करते थे। वे प्रजा के प्रति दयालु थे, देवताओं के भक्त थे और न्यायनिष्ठ शासक के रूप में सर्वत्र प्रसिद्ध थे। उनके महल में पाँच रानियाँ थीं, जो सौन्दर्य और गुणों में अतुलनीय थीं। राजा का जीवन सुख और समृद्धि से परिपूर्ण था। परन्तु विधि का विधान कुछ और ही था। एक के बाद एक, पाँचों रानियों का असमय देहान्त हो गया। राजा शोक से टूट गए। महल के उत्सव थम गए, दरबार में सन्नाटा छा गया। राजा ब्रह्मप्रिय रात-दिन इस दुःख का कारण खोजते रहे और सोचते रहे कि उनसे ऐसा कौन-सा पाप हुआ जिसका यह फल मिला।
व्याकुल मन से राजा एक महान ऋषि के आश्रम में पहुँचे और अपनी व्यथा सुनाई। ऋषि ने उनके दुःख को ध्यान से सुना और कुछ क्षण मौन रहकर बोले कि हे राजन्, तुम्हारे पूर्वजन्म में एक भूल हुई थी, वैशाख शुक्ल चतुर्थी के दिन तुमने विनायक पूजन की उपेक्षा की थी। उस चतुर्थी व्रत का भंग ही इस जन्म के कष्टों का मूल है। ऋषि ने आगे कहा कि संकर्षण विनायक का यह व्रत करने से समस्त दोष शान्त होते हैं, खोया हुआ सुख लौट आता है और जीवन में फिर से प्रकाश भर जाता है। राजा ने श्रद्धापूर्वक विधि-विधान से इस व्रत का अनुष्ठान किया, गणेश के सुमुख स्वरूप की पूजा की, मध्याह्न में धूप-दीप अर्पित किए और ब्राह्मणों को शंख तथा दक्षिणा प्रदान की।
भगवान गणेश अपने भक्तों की पीड़ा देखकर कभी विमुख नहीं होते। राजा की निष्ठा और उनके विनम्र हृदय से प्रसन्न होकर विनायक ने उन्हें स्वप्न में दर्शन दिए। उन्होंने कहा कि तुमने सच्चे मन से व्रत किया है, तुम्हारा पाप नष्ट हो गया है। इसके उपरान्त राजा के जीवन में धीरे-धीरे शान्ति लौट आई, राज्य में फिर से उल्लास छा गया और प्रजा सुखी हुई। तभी से यह विश्वास दृढ़ हुआ कि जो कोई वैशाख शुक्ल चतुर्थी को संकर्षण विनायक का व्रत श्रद्धा से करता है, उसके जीवन की बाधाएँ उसी प्रकार दूर होती हैं जैसे सूर्योदय होते ही अन्धकार छँट जाता है।
संकर्षण विनायक चतुर्थी व्रत पर पढ़े जाने वाले मंत्र
॥ जय गणेशाय नमः ॥
बीज मंत्र
ॐ गं गणपतये नमः ॥
गणेश गायत्री मंत्र
ॐ एकदंताय विद्महे
वक्रतुण्डाय धीमहि
तन्नो दंती प्रचोदयात् ॥
वक्रतुण्ड श्लोक
वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ।
निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा ॥
सुमुख नाम मंत्र
ॐ सुमुखाय नमः ॥
संकर्षण विनायक चतुर्थी व्रत पर इन मंत्रों का जप मध्याह्नकाल की पूजा में करने से विशेष फल मिलता है। बीज मंत्र की एक माला और वक्रतुण्ड श्लोक का पाठ संकटों को दूर करता है तथा मन को शांति देता है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
संकर्षण विनायक चतुर्थी 2026 कब है?
यह व्रत सोमवार, 20 अप्रैल 2026 को मनाया जाएगा। चतुर्थी तिथि 20 अप्रैल को प्रातः 07:27 बजे से प्रारंभ होकर 21 अप्रैल को प्रातः 04:14 बजे तक रहेगी।
संकर्षण विनायक चतुर्थी का पूजा मुहूर्त क्या है?
मध्याह्न पूजा का शुभ मुहूर्त 11:22 बजे से 01:53 बजे तक है। राहु काल (08:35–10:20) में पूजन आरंभ न करें।
इस व्रत में कौन सा दान करना चाहिए?
धर्मसिन्धु और परम्परागत विधान के अनुसार इस विशेष व्रत में ब्राह्मणों को शंख का दान करने का विशेष महत्व है।
क्या इस व्रत में अन्न खा सकते हैं?
नहीं। व्रत के दिन अन्न का त्याग करें और फलाहार या दूध पर रहें। पारण अगले दिन पञ्चमी तिथि में करें।
संकर्षण विनायक चतुर्थी और सामान्य विनायक चतुर्थी में क्या अंतर है?
यह वैशाख मास की शुक्ल चतुर्थी है जिसमें गणेश के सुमुख स्वरूप की उपासना होती है और शंख दान का विशेष विधान है। यह इसे अन्य मासिक विनायक चतुर्थियों से अलग करता है।