विजया एकादशी व्रत 13 फरवरी 2026
विजया एकादशी व्रत कब है - जानिए तिथि
विजया एकादशी व्रत फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को रखा जाता है। वर्ष 2026 में यह व्रत शुक्रवार, 13 फरवरी 2026 को पड़ेगा। पंचांग के अनुसार एकादशी तिथि का प्रारंभ 12 फरवरी 2026 को दोपहर 12:22 PM बजे से होगा और इसका समापन 13 फरवरी 2026 को दोपहर 02:25 PM बजे पर होगा। हिंदू धर्म में उदयातिथि को मान्यता दी जाती है, इसलिए विजया एकादशी का व्रत 13 फरवरी 2026 को ही रखा जाएगा।
व्रत का पारण द्वादशी तिथि में किया जाता है। वर्ष 2026 में विजया एकादशी व्रत का पारण 14 फरवरी 2026 को प्रातः 08:25 AM बजे से 09:14 AM बजे के बीच करना शास्त्रसम्मत माना गया है। हरिवासर समाप्त होने के बाद ही पारण करना चाहिए, अन्यथा व्रत पूर्ण फलदायी नहीं माना जाता।

विजया एकादशी का महात्म्य (एकादशी महात्म्य)
विजया एकादशी को सभी एकादशियों में विशेष स्थान प्राप्त है। “विजया” शब्द स्वयं इस व्रत के फल को स्पष्ट करता है — अर्थात् विजय, सफलता और बाधाओं पर पूर्ण नियंत्रण। पद्म पुराण के अनुसार, यह एकादशी पापों का नाश करने वाली, भय को दूर करने वाली और कठिन परिस्थितियों में विजय दिलाने वाली मानी गई है।
यह व्रत विशेष रूप से उन भक्तों के लिए फलदायी माना गया है जो जीवन में लंबे समय से संघर्ष, शत्रु बाधा, असफलता, मानसिक अशांति या कार्यों में रुकावट का सामना कर रहे हों। विजया एकादशी आत्मबल, धैर्य और निर्णय क्षमता को बढ़ाती है। यही कारण है कि प्राचीन काल में राजा, योद्धा और साधक इस व्रत को विशेष श्रद्धा से करते थे।
विजया एकादशी व्रत की पूजा विधि
- दशमी तिथि के दिन एक समय सात्त्विक भोजन करें और अन्न, दाल व नमक का त्याग करें।
- एकादशी के दिन प्रातः स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें और भगवान विष्णु के समक्ष व्रत का संकल्प लें।
- पद्म पुराण के अनुसार, एक कलश (घड़ा) तैयार करें, जो सोना, चाँदी, ताँबा या मिट्टी में से किसी का बना हो।
- उस कलश को शुद्ध जल से भरें और उसमें सात प्रकार के अंकुरित धान्य डालें।
- कलश के मुख पर जौ (बार्ली) रखें और उसके ऊपर भगवान नारायण की स्वर्ण या प्रतीकात्मक प्रतिमा/चित्र स्थापित करें।
- कलश को पुष्पमाला से सजाएँ और चंदन, धूप, दीप, नैवेद्य अर्पित करें।
- विशेष रूप से नारियल, सुपारी, दीपक, अगरबत्ती और सात्त्विक भोग से भगवान विष्णु की पूजा करें।
- दिनभर उपवास रखते हुए भगवान विष्णु की कथाओं का श्रवण करें या स्वयं कथा का पाठ करें।
- रात्रि में घी का दीपक जलाकर जागरण करें, जिससे व्रत अखंड रूप से पूर्ण हो।
- द्वादशी तिथि की प्रातःकाल में स्नान कर कलश को नदी, सरोवर या बहते जल में विधिपूर्वक विसर्जित करें।
- शास्त्रानुसार, उस कलश को वेदों के ज्ञाता ब्राह्मण को दान देना अत्यंत पुण्यदायक माना गया है।
- सामर्थ्य अनुसार महादान कर व्रत का पारण करें।
विजया एकादशी व्रत कथा (पद्म पुराणानुसार)
पद्म पुराण में वर्णित कथा के अनुसार, धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष में आने वाली एकादशी के विषय में प्रश्न किया। भगवान श्रीकृष्ण ने उत्तर देते हुए नारद और ब्रह्मा जी के संवाद का वर्णन किया। ब्रह्मा जी ने नारद को बताया कि यह एकादशी “विजया एकादशी” कहलाती है और यह अत्यंत प्राचीन, पवित्र तथा पापों का नाश करने वाली है।
कथा के अनुसार, जब भगवान श्रीराम वनवास के समय लंका पर विजय प्राप्त करने की तैयारी कर रहे थे, तब समुद्र पार करना उनके मार्ग की सबसे बड़ी बाधा थी। वानर सेना होते हुए भी कोई उपाय स्पष्ट नहीं था। तब लक्ष्मण जी के सुझाव पर भगवान श्रीराम ऋषि बकदाल्भ्य के आश्रम पहुँचे।
ऋषि बकदाल्भ्य ने भगवान श्रीराम को विजया एकादशी व्रत करने की विधि बताई और कहा कि इस व्रत को पूर्ण श्रद्धा और नियम से करने पर निश्चित ही विजय प्राप्त होगी। भगवान श्रीराम ने विधिपूर्वक विजया एकादशी का व्रत किया। इस व्रत के प्रभाव से समुद्र पार करने का मार्ग प्रशस्त हुआ, वानर सेना ने सेतु निर्माण किया और अंततः लंका विजय तथा रावण वध संभव हुआ।
इस प्रकार विजया एकादशी स्वयं भगवान श्रीराम द्वारा आचरित होने के कारण अत्यंत महत्त्वपूर्ण मानी जाती है।
विजया एकादशी मंत्र
विजया एकादशी के दिन भगवान विष्णु की उपासना हेतु निम्न मंत्रों का जप विशेष फलदायी माना गया है।
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः ॥
ॐ नारायणाय विद्महे
वासुदेवाय धीमहि
तन्नो विष्णुः प्रचोदयात् ॥
इन मंत्रों का श्रद्धापूर्वक जप करने से भय, विघ्न और असफलताओं का नाश होता है तथा जीवन में विजय प्राप्त होती है।
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समापन भाव
विजया एकादशी व्रत केवल उपवास तक सीमित नहीं है, बल्कि यह धैर्य, आस्था और विजय की आध्यात्मिक साधना है। पद्म पुराण में वर्णित भगवान श्रीराम की कथा यह दर्शाती है कि जब परिस्थितियाँ असंभव प्रतीत हों, तब धर्म और श्रद्धा से किया गया व्रत भी मार्ग प्रशस्त कर देता है।
जो भक्त नियमपूर्वक विजया एकादशी का पालन करता है, उसके जीवन में स्थिरता, आत्मबल और सकारात्मक परिवर्तन आते हैं। यह व्रत न केवल बाहरी बाधाओं को दूर करता है, बल्कि भीतर छिपे भय और संशय को भी शांत करता है।